Friday, December 27, 2019

CAA क्या है? इसका विरोध क्यों हो रहा है? पूरी जानकारी




CAA क्या है?

दोस्तों, CAA के बारे में जानने से पहले आइए नागरिकता संशोधन विधेयक यानी citizenship amendment bill (CAB) के बारे में जान लेते हैं। इस विधेयक को बीती नौ दिसंबर को लोकसभा में लाया गया, जहां इसे 80 के मुकाबले 311 मत से पारित कर दिया गया। इसके बाद इस विधेयक को दो ही दिन बाद बीती 11 दिसंबर को राज्यसभा में पेश किया गया, जहां इसके पक्ष में 125 वोट पड़े थे जबकि इसके विरोध में 99 सांसदों ने मतदान किया।

इस तरह संसद के दोनों सदनों में पास होने के बाद इस बिल यानी विधेयक को अगले दिन सुबह 12 दिसंबर को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के समक्ष ले जाया गया, जिन्होंने इस बिल पर हस्ताक्षर कर इसे अपनी मंजूरी दे दी और यह कानून बन गया। कानून बनने के बाद इसे नागरिकता संशोधन कानून कहिए या नागरिक संशोधन अधिनियम यानी CAA पुकारा गया।

CAA में प्रावधान क्या है?

दोस्तों, CAA के जरिए भारत के 3 पड़ोसी मुस्लिम देशों बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों, जिनमें छह समुदाय हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी को धार्मिक या किसी अन्य कारण से अपना देश छोड़कर आने पर भारतीय नागरिकता का प्रावधान किया गया है।

CAA के लिए क्या शर्त रखी गई है?

साथियों, छह अल्पसंख्यक समुदायों के इन लोगों को भारतीय नागरिकता के लिए शर्त यह रखी गई है कि यह अल्पसंख्यक बीते 31 दिसंबर, 2014 से पहले भारत में प्रवेश कर चुके हों। इससे पहले भारतीय नागरिकता के लिए उन्हें इस देश में 11 साल बिताने पड़ते थे, CAA के तहत इस अवधि को घटाकर 6 साल कर दिया गया है।

CAA का विरोध देश में क्यों हो रहा?

दोस्तों, CAA यानी नागरिकता संशोधन अधिनियम का विरोध इस वक्त पूरे देश में हो रहा है। आइए, आपको बताते हैं कि यह विरोध क्यों हो रहा है। दरअसल, इसके विरोध की वजह यह है कि यह कानून जिन अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात कर रहा है, जिन्हें यह प्रदान करने की बात करता है उसमें 6 गैर मुस्लिम समुदाय शामिल हैं। जैसे कि हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी। इनमें मुस्लिमों को शामिल नहीं किया गया है, यही विरोध की जड़ है।

केंद्र सरकार का रुख क्या है?

दोस्तों, इस मामले पर केंद्र सरकार की ओर से अपना रुख स्पष्ट किया जा रहा है। इस अधिनियम को लेकर तमाम गतिरोध को देखते हुए केंद्र सरकार ने अपनी तरफ से लोगों को शांत करने की पूरी कोशिश की है। उसने लोगों को इस बात का भरोसा दिलाया है, कि किसी भी भारतीय नागरिक के किसी भी कानूनी अधिकार से, जो कि उसे संविधान में दिए गए हैं कोई छेड़छाड़ करने का इरादा उनका नहीं है। और ना ही नागरिकता संशोधन अधिनियम का उनके अधिकारों से कोई लेना-देना है। उनका कहना है कि भारत का जो भी वासी चाहे वह हिंदू है, चाहे मुस्लिम है, उसका इस नागरिकता संशोधन अधिनियम से कोई लेना देना नहीं है। इसमें मुसलमानों को शामिल न किए जाने के मसले पर सरकार ने साफ किया है कि वह पहले की तरह देश के नागरिकता कानून के दायरे में होंगें। संविधान का सेक्शन-6 इस संबंध में उनकी सहायता करेगा।

इससे पहले कब लाया गया था विधेयक –

दोस्तों, आपको यह भी बता दें कि इससे पहले इस विधेयक को 8 जनवरी को इसी साल लोकसभा में लाया गया था । जहां से इस विधेयक को पारित कर दिया गया था। इसे इसके बाद संसद के उच्च सदन राज्यसभा में पेश किया जाना था, लेकिन लोकसभा का सत्र समाप्त हो जाने के कारण इसे राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सका था। जिस वजह से यह निष्प्रभावी हो गया था। यही वजह थी कि सरकार ने इसको शीतकालीन सत्र में लाने की सोची थी। और ऐसा उन्होंने किया भी।

जैसा कि हम ऊपर बता चुके हैं कि बीती नौ दिसंबर को यह विधेयक लोकसभा में पेश किया गया, जहां यह 80 के मुकाबले 311 वोट से पास हो गया। इसके बाद फिर इसे 11 दिसंबर को राज्यसभा में भेजा गया। दोस्तों, लगे हाथों आपको यह भी बता दें कि अगर जनवरी के महीने में राज्यसभा में यह बिल पास हो गया होता और लोकसभा में ना हुआ होता तो उस वक्त निष्प्रभावी नहीं होता। और उसे दोबारा से सदन में पेश करने की जरूरत ना पड़ती। लेकिन क्योंकि ऐसा नहीं हुआ था, इसलिए इसको दोबारा सदन में लाया गया और यह राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही कानून बन गया।

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